#Gazal by Ishq Sharma

ज़ालिम किसे मरने की रज़ा देती है

बे’गुनाहों को बे’ख़ौफ़ सज़ा देती है

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खुशियां भी चंद पलो की मेहमां है

भला ज़िंदगी किसको मजा देती है

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ज़िंदगी से लड़ते – लड़ते  टूट  गए

उम्मीद भी कब किसे अजा देती है

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काफी सन्नाटा पसरा रहता है अंदर

जब ये नगाड़े के जैसे बजा देती है

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ये अंतर्मन जब कोसता है खुद को

तब रूह, जिस्म  को  क़ज़ा देती है

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© इश्क़शर्माप्यारसे✍📲9827237387

 

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