#Gazal by Ishq Sharma

ग़ज़ल लिख वो  बात सारी गुन-गुनाते रहे

हम वहीं के वहीं  रात सारी छटपटाते रहे

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दर्द-ए-दिल ने दाँत भींचे  लब ख़ामोश थे

फिर भी महफ़िल में हम भी मुस्कुरातें रहे

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सरेमहफ़िल मुस्कुराना भी तो लाज़मी था

ज़ख़्म मेरे  उंगलियों से  वो  गुदगुदाते रहे

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भूल बैठा है हरजाई गुफ़्तगू सर्द रातों की

बाँहों के दरमियां रख उन्हें हम बचाते रहे

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ख़ौफ़ज़दा है  तब  से  ये  इश्क़ मेरा यारों

टूट – बिखरा घर जिसे  ताउम्र सजाते रहे

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गैर सारे लौट आये  खुशनुमा  उन्ही से हैं

बेवज़ह हम अपने अपनो को  मनाते रहे

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ख़्वाबों में जब भी  दीदार की  तलब रही

लम्हा – लम्हा वो  इंतज़ार हमें कराते रहे

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नींद से जागते ही  होश में लाया खुद को

देखकर तस्वीर फिर हम आँसू बहाते रहे

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इत्मिनान से  रो कर हम किनारे बैठ गए

और करबद्ध हम खुदासे गिड़गिड़ाते रहे

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रोग ए इश्क़ उनका हमे  बीमार कर गया

कर्ज़ दवा-दारू का यारों  हम चुकाते रहे

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© इश्क़शर्माप्यारसे✍9827237387

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