#Gazal by Ishq Sharma

मेरी नज़र में जब तू नज़र नहीं आता है
सच कहता हूँ  कुछ नज़र नहीं आता है
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रोजमर्रा में  भी अब चैन ऒ सुकूँ कहाँ
तुझ सा  कोई  मुझे नज़र नही आता है
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आते है  मुझे  अजीब ख़याल बेहिसाब
ख़यालों  में  बस तू नज़र नहीं आता है
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राह’ऐ’वफ़ा में साथ-साथ चलते गए थे
अब मिलों तक  तू  नज़र नहीं आता है
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धुंधली छवि भी तेरी धूमिल हो चुकी है
मुझे इस धुँएमें कुछ नज़र नहीं आता है
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जिस आसमां में सितारें भी जड़े थे मैंने
इस सावन में वो भी नज़र नहीं आता है
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उसकी खुशियाँ मुझे  बर्दाश्त  नही होती
इसकेसिवा उसे कुछ नज़र नहीं आताहै
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मगर बेख़बर को  यह  ख़बर ही नहीं है
उसके सिवा कुछभी नज़र नहीं आता है
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समझाता हूँ अपने दिल की हरबात उसे
समझता हुआवो मुझे नज़र नहीं आताहै
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बस यही सोचकर चुपचाप रहता हूँ अब
अंधों को कुछ कभी नज़र नहीं आता है
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वो दिनके उजाले में भी मौजूद रहता है
मगर चाँद किसीको नज़र नहीं आता है
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हवाओं ने  अब रूख बदल तो लिया है
उड़ता उधर कुछभी नज़र नहीं आता है
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रग रग में इश्क़ उस खुदा की ही देन है
और देने वाला कभी नज़र नहीं आता है
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© इश्क़शर्माप्यारसे 9827237387

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