#Gazal by Jalaram Jajbati

मफऊ लुफा इलात मफा ई लुफा इलुन

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ऐसा था कोई मोड़ कि मजबूर हो गया,

उसके भले के वास्ते में दूर हो गया।

 

हैरत से लोग बाग सभी देखते रहे,

मैं उस को और वो मुझे मन्जूर हो गया।

 

करता नही है कोई वफ़ा आजकल यँहा,

केवल जफ़ा ज़माने का दस्तूर हो गया।

 

टिकते नही है पाँव ही उस के ज़मीन पर,

छोटी सी जंग जीत के मगरूर हो गया।

 

थी कल तलक स्याह अँधेरे सी जिन्दगी,

सूरज का बिम्ब पड़ते ही मैं नूर हो गया।

जे आर जज़्बाती

 

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