#Gazal by Jasveer Singh Haldhar

गजल

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मिले जब हुस्न की दौलत बनावट आ हि जाती है !

खुदा ने रूप वक्सा तो  सजावट छा हि जाती है !

भला हो उन हसीनों का छुपाएँ हुस्न पर्दे में ,

नजर पैनी अगर आशिक नजारे पा हि जाती है !

घनी जुल्फें घने साये सताता हैं घना पर्दा ,

पड़ें खुर्शीद की किरणें हसीं कुमला हि जाती है !

लगा के आग पानी में बनी पर्दा नसीं है वो ,

लिबासों में छिपी बेसक बशर को भा हि जाती है !

जरा टहली चमन में और उसकी खैर भी जानी ,

हरकतें देख भँवरों की कली शरमा हि जाती है !

बनाया इस्क मौला ने बनाई ये धरा जन्नत ,

दरिंदों की जमातों से परी घबरा हि जाती है !

फ़लक की हूर के पीछे ख़लक़ बैठी परी सहमी ,

बढ़े जब कौम कीड़ों की फसल को खा हि जाती है !

खुदा का वास्ता “हलधर “बनाओ ना जमीं दोज़ख ,

मगर ये कौम आतंकी कहर तो ढा हि जाती है !

हलधर

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