#Gazal by Jasveer Singh Haldhar

झाड में रहते गए हम राह से डोले नहीं !

बाढ़ में बहते गए हम पंख भी खोले नहीं !

आसमानों के परिंदे नीर से क्या वास्ता ,

बोझ सब सहते गए हम भार को तोले नहीं !

आधियाँ अक्सर हमारा रोकती हैं रास्ता ,

सर्द को गहते गए हम दर्द में बोले नहीं !

भोज में होते धमाके गोलियों का नास्ता,

दुश्मनी ढहते गए हम ज़ख्म भी छोले नहीं !

रोग पीड़ित इक पड़ौसी रोज ही तो खाँसता ,

आग की झांकी दिखाता पास में शोले नहीं !

भीख में लेता रहा जो चाउमीन व पास्ता ,

रोब में आए न” हलधर “बात विष घोले नहीं !

हलधर -9897346173

 

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