#Gazal by Jasveer singh Haldhar

मुक्तिका (ग़ज़ल)-कल तो हमारा है

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नहीं है आज सिर पै ताज पर कल तो हमारा है ।

चलें  देखें  समंदर  का  कहां  दूजा  किनारा  है ।

सजी मंदिर कि मूरत बोल सकती है अगर चाहो ,

लगे उसको किसी ने आज अंदर से पुकारा है ।

नुकीली धार पानी की जमा पर्वत हिला देती ,

यकीं ना हो तो देखो गंग को किसने उतारा है ।

जरा सी चोट लगती है कलेजा मात का हिलता ,

खुदाई जोड़ ममता का अनौखा ही पिटारा है ।

कभी सोचा नहीं हमने पिताजी छोड़ जाएंगे ,

लगाया शजर हांथों से वही अब तो सहारा है ।

गिने क्या पैर के छाले कभी अपने बज़ुर्गों के ,

जलाकर हाथ अपने आग में हमको सँवारा है ।

लपट आने लगी आतंक की बहती हवाओं में ,

लिए पत्थर खड़ा जो सामने किसका दुलारा है ।

हलधर -9897346173

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