#Gazal by Jitendra Yadav

कोरी अफ़वाह है की इश्क़ में बरबाद हूँ मैं,
आब-ए-चश्म भी मुस्कुराते हैं इतना शाद हूँ मैं।

चमक कायम है आँखों की इंतेज़ार की बदौलत,
और विसाल-ए-यार की तमन्ना से आबाद हूँ मैं।

कुछ को ताज़्जुब है कि मैं इतना शाद कैसे हूँ,
शायद ठीक हीं कहा था तुमनें अपवाद हूँ मैं।

यूँ तो हमें इल्म न था रवायत-ए-इश्क़ के बारे
पर मशवरा लिया जाता है मानो उस्ताद हूँ मैं।

इक़बाल है कि इत्तिफ़ाक़न इश्क़ बेग़ैरत से हुआ
पर इब्तिला है की दर्द-ए-दिल से आज़ाद हूँ मैं।

©जितेन्द्र_यादव

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