#Gazal by Jitendra Yadav

अल्फ़ाज़ बग़ावत पे उतारू हैं तुम्हें लिखना इनको रास नहीं होता,

मन बेबस पड़ा है एक तेरे शिवाय कुछ और इसके पास नहीं होता।

 

धड़कन भी धड़कती है निरीह भाव से काम तो इसका भी कोई खास नहीं होता,

हुनर हमनें भी सीख लिया झूठी मुस्कान का लोगों की नज़र में उदास नहीं होता।

 

वो साख तो कब की टूट चुकी “जितेन्द्र” जहाँ कभी आशियाना हुआ करता था,

पर ये नादान परिंदा अब भी मंडराता है उसी जगह की इसको विश्वास नहीं होता।।

 

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One thought on “#Gazal by Jitendra Yadav

  • September 19, 2017 at 10:09 am
    Permalink

    Kya baat jitendra bhai. Kamal kar diya

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