#Gazal by Jitendra Yadav

गिरी हैं कुछ बूंदें आज बेवक़्त आसमान से ऐसे,

कि रेगिस्तान में भी चाहत का शैलाब आ गया।

 

कहीं फिसली हैं बूंदें पिले फूलों से आहिस्ता-2,

कहीं चिपकनें से मौसम-ए-गुलाब आ गया।

 

हम भी बरसे हैं बेवक़्त बेहिसाब, बे-कदर के लिए,

यूँ कि आँशुओं और बूँदों का हिसाब आ गया।

 

हम तो बकते रहे, लिखते रहे उन्हें हर्फ़-दर-हर्फ़,

पर बेरुख-ख़ामोशी से उनका ज़बाब आ गया।

 

खामख्वाह ख़फ़ा था तू हमदर्द निकला ये दोस्त,

जो तू ऐसे मौसम में ले के शराब आ गया।

 

आ बैठ छलकाते हैं ज़ाम ख़ुद से टकरा कर

ये सोच की थाली में यादों का क़बाब आ गया।

 

ये आशिक़ों ज़रा काबू में रखना अपनें दिल को,

बहकाने कामदेव का बिगड़ा ज़नाब(बसंत)आ गया।

जितेन्द्र_यादव

 

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