#Gazal by Jyoti Mishra

आज फिर शहर में, वो कहानी पुरानी हुई

हुआ लाचार बूढा पिता, मां बेबस दीवानी हुई

 

कल जो थे घर के बड़े  ,नजरे हैं झुकाये खड़े

ताजा अखबार हैं बीबियां, मां रद्दी पुरानी हुई

 

पूछते हैं बेटे -बहू ,वसीयत में क्या मुझको दिया

बैंक बैलेंस प्यारा हुआ, मां की ममता बेमानी हुई

 

सोचती ये बूढी हड्डियां , दुख किससे अपना कहूं

बोली सुख, चैन ,प्यार की, जाने कब की रवानी हुई

 

भूल जाओ न तुम ये कभी, हाल सबका होना यही

चार दिन का बुढापा है तो चार दिन की जवानी हुई

 

नूर रहमत का टपके सदा, सर पर  आशीष भरा हाथ हो

खुशियां फिर कभी कम न हों, जिन्दगी भी नुरानी हुई …!!

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