# Gazal by Kamlesh Srivastava

लग गईं पाबंदियाँ कुछ दिन से जीने पर ।

जम गई है धूल किस्मत की ,पसीने पर ।

 

क्या सफ़र कर पायेंगे वो इस सफ़ीने पर ।

वक़्त का पत्थर रखा है जिनके सीने पर ।

 

रूह की दौलत लिए आये थे दुनिया में ।

ढँक दिए करमों ने चिथड़े उस नगीने पर ।

 

बढ़ गए जबसे अँधेरे दिल की बस्ती में ।

हम दिया रखने लगे यादों के ज़ीने पर ।

 

ज़िन्दगी को लोग क्यों विष की तरह पीते ।

गर न होतीं बंदिशें , अमृत के पीने पर ।

 

मुँह खुले ज़ख़्मों में इतनी बेकली कब थी ।

टीस उठ्ठी है बहुत ज़ख़्मों को सीने पर ।

 

कमलेश श्रीवास्तव ।

094250 84542

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