#Gazal by Kamlesh Srivastava

भले ख़ुश हों न हों, बाहर तो ख़ुद को ख़ुश दिखाना है ।

छलक लेना ए आँखो फिर अभी तो मुस्कुराना है ।

 

अभी भी तैरते तो हैं मगर अब दम नहीं बाक़ी ।

बख़ूबी जानते हैं हम कि इक दिन डूब जाना है ।

 

न कोई शख़्सियत गहरी न किरदारों में सच्चाई ।

बड़ी उथली है ये दुनिया बहुत झूठा ज़माना है ।

 

न दिल में खुशबुऐं उड़तीं न होता रक़्स ख़ुशियों का ।

मगर इन ख़ुश्क होठों पर उम्मीदों का तराना है ।

 

मेरी जेबें तो खाली हैं मगर हूँ बादशा फिर भी ।

मेरे मासूम से दिल में मुहब्बत का ख़ज़ाना है ।

 

यहाँ कैसे लगेगा दिल यहाँ कैसे रमेंगे हम ।

जिसे तुम ज़िन्दगी कहते असल में क़ैदख़ाना है ।

 

हमीं ने ख़ुद को मारा है हमीं मारेंगे फिर ख़ुद को ।

हमीं ख़ुद हैं निशाने पर हमारा ही निशाना है ।

 

कमलेश श्रीवास्तव ।

094250 84542

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