#Gazal by Karan Sahar

हमें वो भूल जाएँगे, हमें क्यों ऐसा लगता है,

फ़िज़ा का रंग, हवा का ढंग उन्हीं के जैसा लगता है।।

 

दवाई भी नहीं लगती मरीज़-ए-इश्क को अब तो,

मगर दीदार भी उनका दवा के जैसा लगता है।।

 

ज़माने की नहीं सुनना, ज़माना झूठ कहता है,

इसे तो फूल में खुशबू भी ऐसा-वैसा लगता है।।

 

यहां की मिट्टी को देखो कितनी रेशमी सी है,

ग़ज़ल का दुपट्टा देखा है, बिल्कुल ऐसा लगता है।।

 

हमने इश्क तो हद से गुज़र के की थी  लेकिन,

इश्क में मर के नहीं देखा कि कैसा लगता है।।

 

जैसे घी के दीये से घर घर रोशन लगता है,

तुम से भी मेरे दिल को बिल्कुल वैसा लगता है।।

 

देखो तुम मेरे बारे में इतना भी नहीं सोचो,

कि सहर ऐसा लगता है या सहर वैसा लगता है।।

 

-सहर

 

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