#Gazal by Karan Sahar

अपनी मर्ज़ी से दगा खाने तक,

हम न रोएंगे तेरे आने तक।।

 

मुद्दतों बाद तेरा आना हुआ,

हम न लौटेंगे तेरे जाने तक।।

 

चैन आएगा न सुकूं होगा,

तुम को गले से लगाने तक।।

 

इस क़दर ज़ख़्म दिए साकी ने,

उठ के जा भी न सके दवाखाने तक।।

 

हमने लोगों का क्या बिगाड़ा था,

हमको तन्हा किया ज़माने तक।।

 

सहर

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