#Gazal by Karan Sahar

कुछ रोज़ से दिल में अजीब ज़िम्मेदारी है,

तभी मैं सोचूँ, क्यों मेरी साँस भारी है ।।

 

जीना तो कभी का छोड़ बैठा है “सहर”,

बस ये साँसों का आना जाना जारी है ।।

 

अभी कहाँ चल दीं तुम, ऐ ज़र्द रातें,

अभी तुमसे ख्वाबों की कईं देनदारी है ।।

 

कहीं से भी देखूँ, ये आँखें मुझे ही ताकती हैं,

तुम्हारी तस्वीर की भी क्या ख़ूब अदाकारी है ।।

 

यही तो असल पहचान है हमारी मुहब्बत की,

कि अब तक हम भी कुंवारे हैं और वो भी कुंवारी है ।।

 

-सहर

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