#Gazal by Karan Sahar

हमें तो मुहब्बत ही में मज़ा आता है,

अब कहाँ ज़िन्दगी में मज़ा आता है ।

 

आदत छूट गई तेरी गोद में पड़े रहने की,

अब तो तेरी बेरुखी में मज़ा आता है ।

 

तुम्हें गुरूर होगा, अपने हुस्न पे ऐ सहर,

मगर शब को अपनी सादगी में मज़ा आता है ।

 

इन्हें कहाँ वक्त है मीर-ए-आसमाँ छूने का,

ये मेरी ग़ज़लें हैं, इन्हें मेरी पैरवी में मज़ा आता है ।

 

मेरा वक्त ही मेरा सच्चा हमसफर है शायद,

तभी सोचूँ इसे क्यों मेरी हर खुशी में मज़ा आता है ।।

 

सहर

 

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