#Gazal by Karan Sahar

ज़मीं पे बिछे मुफलिसी के टाट पे सोता हूँ,

रिश्तों की डोरी पर, आँखों से मोती पिरोता हूँ ।

 

कागज़ की तिजोरी में कई ख़्वाब रखे हैं मैंने,

टपकती झोंपडी से मैं कई सपने भिगोता हूँ ।

 

मेरे कांधे की हिम्मत और भी मकबूल है जब से,

लिफ़ाफ़े में भर कर अपनों की भूख ढोता हूँ ।

 

कतारों में लग कर भी कुछ नहीं पाया है मैंने

राशन के नाम पर महज़ उम्मीदें संजोता हूँ ।

 

आँसू, भूख, गरीबी, मौत, यही दौलत है मेरी,

रुपया क्या है,ख़ुदा जाने,मैं तो अनाज बौता हूँ ।

 

बदन पर एक ही कपड़ा है, मगर साफ-सुथरा है,

रोज़ इसी धोती को मैं कईं टुकड़ों में धोता हूँ ।

 

सर्दी है तो होगी, मेरा तो एक ही जिस्म है,

उसे ही ओढ़ता हूँ मैं, उसे ही मैं बिछोता हूँ ।

 

~सहर

 

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