#Gazal by Karan Sahar

कतारों में खड़ी हैं जो ये ओस की बूँदें,

किसी भी पल में छलकने को तैयार हैं ।।

 

अभी ये रातें मशरूफ हैं इश्क़ जताने में,

इसे जगाने की कोशिशें अभी बेकार हैं ।।

 

ऊपर वो आसमाँ भड़क रहा है मुझ पर,

आज फिर उसके बरसने के आसार हैं ।।

 

बिल्कुल मेरी ही तरह ये आँखे भी नहीं सोतीं,

मुझे शक है कि शायद ये भी बीमार हैं ।।

 

अब मेरे जिस्म को, तेरा साया बोझ लगता है,

मैं हैरान हूँ कि मेरे हौंसले भी लाचार हैं ।।

 

ख़्वाब, बेचैनी, तन्हाई और कुछ सदाएं,

तुम्हारे बाद, यही सब तो मेरे घर-बार हैं ।।

 

#करन_सहर

 

 

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