#Gazal by Karan Sahar

उम्र इक उड़ता हुआ परिंदा है

मुझे ले कर न उड़ जाए कहीं ।।

 

मैं तो बस राख का पुतला हूँ,

मुझे आँसू न बहा ले जाए कहीं ।।

 

सब्र रखता हूँ, तभी डर लगता है

कि मंज़िलें ही न रुठ जाए कहीं ।।

 

मौत आना तय है, मगर सोचता हूँ,

कि तू जन्नत में भी न मिल जाए कहीं ।।

 

एक टुकड़ा जो मेरे ख़्वाबों से आया है,

मेरी तकदीर के आगे न झुक जाए कहीं ।।

 

मेरे दिल को ज़रा खंगाल के देखो,

मगर ध्यान से हाथ न जल जाए कहीं ।।

 

जो भी पर्दे में है, सब झूठ है जालिम,

कस के रखना ये पर्दा न उड़ जाए कहीं ।।

 

किसी भी सख़्श का रहम-ओ-करम रहे

बस इतना के वो खुदा न बन जाए कहीं ।।

 

#करन_सहर

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