#Gazal by Karan Sahar

मैं जो दीवारों से टकराता रहा

अपने साये से भी घबराता रहा ।।

 

एक पोटली मिली तेरी यादों की,

देर तक हाथों से सहलाता रहा ।।

 

समंदर को ज़रा रो लेने दे सहर,

बेचारा रात भर मुस्कुराता रहा ।।

 

जो भी पहना इस पापी बदन ने

हर पहने का रंग जाता रहा ।।

 

वो चुपचाप ज़िंदगी से चली गई,

और मैं देर तक चिल्लाता रहा ।।

 

मैं सच मे तन्हा हो गया हूँ शायद,

कल रात अकेले में बुदबुदाता रहा ।।

 

किस के आने की ख़बर सुन कर,

घर मेरा देर तक गुर्राता रहा ।।

 

रात भर जागने का क्या मतलब,

वो क्या तारा है जो जगमगाता रहा ।।

 

और तो क्या कर सकता था मैं भी,

तेरी यादों में खूद को रुलाता रहा ।।

 

बस करूँ या कह दूं वो सारी बातें,

जिन्हें मैं आज तक दफ़नाता रहा ।।

 

#करन_सहर

Leave a Reply

Your email address will not be published.