#Gazal by Karan Sahar

मैं किसी कतरे का मोहताज नहीं,

तेरी सिसकी हूँ, तेरी आवाज़ नहीं ।।

 

देना ही है तो तेरी रूह दे, साया दे,

ऊपरी जिस्म का ये ताज नहीं ।।

 

मैं तो लम्हों को भिगो कर जीता हूँ,

ये तो आदत है मेरी, अंदाज़ नहीं ।।

 

मेरी आँखों का जो ये काला पन है,

इसमें सपने हैं कोई राज़ नहीं ।।

 

मेरी ग़ज़लों में जो तुम्हें दिखता है,

ये सब एहसास हैं अल्फ़ाज़ नहीं ।।

 

#करन_सहर

 

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