#Gazal by Karan Sahar

ख़्वाब

 

ग़मों को इस कदर पाला है मैंने,

ख़्वाब टुकड़ों में भी संभाला है मैंने।।

 

इश्क़ हो या ना हो मगर फिर भी,

रात भर आंखों से आँसू निकाला है मैंने।।

 

बुझ ना जाए कहीं जीने की तमन्ना मुझ में,

इसलिए हंस के कुछ देर शमा बाला है मैंने।।

 

मुझ में एक जब्त सा कमरा नज़र आता है,

नाजाने किन गैरों को दिल के कमरे में डाला है मैंने।।

 

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