#Gazal by Karan Sahar

इक शाम कुछ पतंगों को उड़ते हुए देखा था
कि मैंने इन हवाओं को मुड़ते हुए देखा था ।।

मेरा मुकद्दर तो मुझ से झूठ कहता रहा मगर
मैने इन रेखाओं को सिकुड़ते हुए देखा था ।।

ये मुहब्बत का शज़र है, उखड़ने नहीं वाला,
मैंने कल रात ही दो शाखाओं को जुड़ते हुए देखा था ।।

मेरे महबूब की तबियत नासाज़ है शायद,
मैंने कल ख़्वाब में दवाओं को उमड़ते हुए देखा था।।

करन “सहर”

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