#Gazal By Karan Sahar

! एक ग़ज़ल !

समझ पाता जो मेरी तर्जुमानी को
उसे मैं कह सुनाता इस कहानी को ।

जिसे भी ऐब था गहरे समंदर का,
वही तरसा है अब पीने के पानी को ।

चले जाना मगर ये बात भी सुन ले,
सहेजूँगा नहीं तेरी निशानी को ।

लहू में आग है ना होशियारी है
न जाने क्या हुआ अब के जवानी को ।

लिखावट तो बदल लोगे मगर साकी,
बदल पाओगे क्या गुज़री कहानी को ।

#करन_सहर

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