Gazal by Kashan Iqbal Pahalwan

जबीं की धूल जिगर की जलन छुपाएगा,

शुरू-ए-इश्क़ है वो फ़ितरतन छुपाएगा..

 

दमक रहा है जो नस नस की तिश्नगी से बदन,

इस आग को ना तिरा पैरहन छुपाएगा..

 

तिरा इलाज शिफ़ा-गाह-ए-अस्र-ए-नौ में नहीं,

ख़िरद के घाव तू दीवाना-पन छुपाएगा..

 

हिसार-ए-ज़ब्त है अब्र-ए-रवाँ की परछाईं,

मलाल-ए-रूह को कब तक बदन छुपाएगा..

 

नज़र का फ़र्द-ए-अमल से है सिलसिला दरकार,

यक़ीं ना कर ये सियाही कफ़न छुपाएगा..

 

किसे ख़बर थी कि ये दौर-ए-ख़ुद-ग़रज़ इक दिन,

जुनूँ से क़ीमत-ए-दार-ओ-रसन छुपाएगा..

 

तिरे कमाल के धब्बे तिरे उरूज के दाग़,

छुपाएगा तो कोई अहल-ए-फ़न छुपाएगा..

 

जिसे है फ़ैज़ मिरी ख़ानक़ाह से ‘काशान ‘,

वो किस तरह मिरा रंग-ए-सुख़न छुपाएगा..

 

By:- जनाब काशान इक़बाल साहब।

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