#Gazal by Kashan Iqbal Pahlwan

कितने भूले हुए नग़्मात सुनाने आए,

फिर तिरे ख़्वाब मुझे मुझ से चुराने आए..

 

फिर धनक-रंग तमन्नाओं ने घेरा मुझ को,

फिर तिरे ख़त मुझे दीवाना बनाने आए..

 

फिर तिरी याद में आँखें हुईं शबनम शबनम,

फिर वही नींद ना आने के ज़माने आए..

 

फिर तिरा ज़िक्र किया बाद-ए-सबा ने मुझ से,

फिर मिरे दिल को धड़कने के बहाने आए..

 

फिर मिरे कासा-ए-ख़ाली का मुक़द्दर जागा,

फिर मिरे हाथ मोहब्बत के ख़ज़ाने आए..

 

शर्त सैलाब समोने की लगा रक्खी थी,

और दो अश्क भी हम से न छुपाने आए..

 

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