#Gazal by Kashan Iqbal Pahlwan

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,

और तू मेरे गांव को गँवार कहता है   //

 

ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है  //

तू बच्ची को भी हुस्न – ए – बहार कहता है  //

 

थक  गया है हर शख़्स काम करते करते  //

तू इसे अमीरी का बाज़ार कहता है।

 

गांव  चलो वक्त ही वक्त  है सबके पास  !!

तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है //

 

मौन  होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं  //

तू इस मशीनी दौर  को परिवार कहता है //

 

जिनकी सेवा में खपा  देते थे जीवन सारा,

तू उन माँ बाप  को अब भार कहता है  //

 

वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे,

तू दस्तूर  निभाने को रिश्तेदार कहता है //

 

बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें //

तु  अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार  कहता है //

 

बैठ जाते थे अपने पराये सब बैलगाडी में  //

पूरा परिवार  भी न बैठ पाये उसे तू कार कहता है  //

 

अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं //

तू इस नये दौर  को संस्कार कहता है  *

 

कितने भूले हुए नग़्मात सुनाने आए,

फिर तिरे ख़्वाब मुझे मुझ से चुराने आए..

 

फिर धनक-रंग तमन्नाओं ने घेरा मुझ को,

फिर तिरे ख़त मुझे दीवाना बनाने आए..

 

फिर तिरी याद में आँखें हुईं शबनम शबनम,

फिर वही नींद ना आने के ज़माने आए..

 

फिर तिरा ज़िक्र किया बाद-ए-सबा ने मुझ से,

फिर मिरे दिल को धड़कने के बहाने आए..

 

फिर मिरे कासा-ए-ख़ाली का मुक़द्दर जागा,

फिर मिरे हाथ मोहब्बत के ख़ज़ाने आए..

 

शर्त सैलाब समोने की लगा रक्खी थी,

और दो अश्क भी हम से न छुपाने आए..!!

 

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