#Gazal by Kashan Iqbal Pahlwan

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,

और तू मेरे गांव को गँवार कहता है   //

 

ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है  //

तू बच्ची को भी हुस्न – ए – बहार कहता है  //

 

थक  गया है हर शख़्स काम करते करते  //

तू इसे अमीरी का बाज़ार कहता है।

 

गांव  चलो वक्त ही वक्त  है सबके पास  !!

तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है //

 

मौन  होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं  //

तू इस मशीनी दौर  को परिवार कहता है //

 

जिनकी सेवा में खपा  देते थे जीवन सारा,

तू उन माँ बाप  को अब भार कहता है  //

 

वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे,

तू दस्तूर  निभाने को रिश्तेदार कहता है //

 

बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें //

तु  अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार  कहता है //

 

बैठ जाते थे अपने पराये सब बैलगाडी में  //

पूरा परिवार  भी न बैठ पाये उसे तू कार कहता है  //

 

अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं //

तू इस नये दौर  को संस्कार कहता है  *

 

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