#Gazal by Kavi Arvind Srivastava Dard

गज़ल़  –‘-

गरीबी के दिनों में जिन्दगी बेजार लगती है,

हमें यह जिंदगी अब दोस्तों दुश् वार लगती है ।

हवाओं के भरोसे है हमारी नाव दरिया में,

न यह इस पार लगती है,न यह उस पार लगती है ।

न दौलत ही मिली जग में, न शोहरत ने कदम चूमे,

अधूरी चाहतें दिल पर चुभी कटार लगती है।

मोबाइल फोन पर है बस नफ़ा नुकसान की बातें,

बदलते दौर में यह जिंदगी व्यापार लगती है ।

कभी मयखाने में दिखते, कभी मंदिर की सीढ़ी पर,

‘दर्द ‘ ये जिंदगी उलझी हुई किरदार लगती है

 

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