#Gazal by Kavi Sharad Ajmera Vakil

ये जमीं ये सारा आसमान उसका ।

हे मालिक वह सारा जहां उसीका ।।

 

भूखे को भोजन पानी कर्म अनुसार ।

रचा ये विचित्र संविधान उसीका ।।

 

पशु पक्षी जीव जंतू हे जो निर्मन ।

ये हवसी मन का इंसान उसीका ।।

 

पहाड़ नदी कलकल करते झरने ।

कुदरत का रचा हर निर्माण उसीका ।।

 

फूल कली से महकता गुलज़ार ये ।

हे बागबां वो,  गुलिस्तान उसीका ।।

 

इश्क मोहब्बत खुशीदुःख अहसास ।

कहीं गम है कहीं मुस्कान उसीका ।।

 

योग वियोग संयोग ये सब “”वकील””

जहाँ में तेरा आना जाना उसीका ।।

 

कवि शरद अजमेरा “वकील”

 

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