#Gazal by Krishan Kumar Tiwari Neerav

गजल

भाव अब लेखनी में समाने लगे, शेर गज़लों के हमको भी आने लगे।

घर की दीवार थोड़ी सी क्या ढ़ह गई ,

सब उधर से ही रस्ता बनाने लगे। हाथ जैसे ही यह मुश्किलों में फंसा,

खास भी अपना दामन छुड़ाने लगे।

उसकी दस वर्ष सीधे उमर बढ़ गई,

आजकल जिसके बच्चे कमाने लगे ।

पेट का भार कंधों पे जब से पड़ा, कहकहे खुद ब खुद भूल जाने लगे ।

मेरा दुर्दिन कभी सुख से बैठा नहीं,

हम भले चारपाई बिछाने लगे। अपनी शिक्षा पर खुद नाज होने लगा,

आज बच्चों को जब हम पढ़ाने लगे ।

अब यही बात है जो बड़ा हो गया, उसके प्रति लोग रोटी बढ़ाने लगे।

उल्टा पहना है कपड़ा पता तब चला ,

लोग मेरी हंसी जब उड़ाने लगे।  झेलते-झेलते बाल जब पक गये,

तब कहीं जाके डाई लगाने लगे। तो

एक फरियाद मालिक से क्या कर दिया ,

हम अनायास नजरों में आने लगे।

डॉ. कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

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