#Gazal By Kuldeep Patel

पलट कर देखे कितना भी,,,अपनी गिरेबां नजर नही आती।
दिख जाती है दुनिया मगर अपनी आसमां नजर नही आती।

महबूब की महज चंद मुलाकातो में,,खुदा नजर आ जाता है,
मगर उम्र भर साथ रह कर भी,,,,कभी माँ नजर नही आती।

संवरते जा रहे सितमगर सारे,,,,,,,तोड़कर नाजुक दिलो को,
मगर टूटकर फिर कभी मुस्कुराने की आशां नजर नही आती

यूं अचानक यहाँ कैसे बादल छा गए हर तलब मायूसीयत के
उम्र के इस पड़ाव में भी कहीं जबां जबां नजर नही आती।

कुछ ख्याब पाले थे कभी,,,जिंदगी में खुशियां लाने के लिए,
चलते कदम थम गए है,आगे रास्ता आसां नजर नही आती।

मोहब्बत के बाजार में आजकल व्यापार तो खूब चल रहा है,
मगर उस बाजार में खुशियों की कहीं दुकां नजर नही आती

चाहत है किसी के दिलमे रहने और किसी को दिल रखने की
मगर कभी टूटे न ऐसी कोई मजबूत,मकां नजर नही आती।

कसमें वादों में दिनोंदिन उलझते और उलझाते जा रहे है हम
झूठ फरेब में तब्दील हो न ऐसी कोई जबां नजर नही आती।

कुलदीप पटेल

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