#Gazal by Kumar Vijay Rahi

कैसे कह दूं, ख़ाब सुहाना रहता है?

मेरी आंखों में वीराना रहता है !

तेरे दिल से पागल होकर निकला हूं,

पागल का कोई ठौर-ठिकाना रहता है !

तुम उसकों अच्छी लगती हो..लेकिन हां,

त़हखानें मे भी त़हखाना रहता है !

उससे मिलने का मौका मिल जाये बस,

घर तो उसके आना-जाना रहता है !

जिनकी चाहत सच्ची होती है उनका,

सदियों तक जिंदा अफ़साना रहता है !

इक पागल की बात सुनी है जिस दिन से,

मेरे अन्दर पागलख़ाना रहता है ।

चाहे जितना दिन-भर खेलें-कूदें हम,

सांझ ढले सबको घर जाना रहता है !

राहीकी हालत क्या तुमको बतलाऊं ?,

आवारा – पागल – मस्ताना रहता है !

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