#Gazal by Kumar Vijay Rahi

ग़ज़ल
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है इतना मुख़्तसर किस्सा हमारा…
यहां कोई नही अपना हमारा…

यहाँ तुम जो ये सहरा देखते हो,
यहीं पर था कभी दरिया हमारा…

गुज़रते है तेरे कूचे से अब भी,
बदलता ही नही रस्ता हमारा…

यही डर हमको खाये जा रहा है ,..
तुम्हारे बाद क्या होगा हमारा…?

कभी अपने ही दिल से पूछ लेना,
तुम्हारे पास है क्या-क्या हमारा ?
©विजय ‘राही’
ग्रामपोस्ट-बिलौना कला
तहसील-लालसोट
जिला-दौसा(राजस्थान)
मो.न.9929475744

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