#Gazal by Lata Rathore

ख़ामोश था हर कोई , हर किसी पर एक सवाल था,
जिंदगी का फ़लसफ़ा समझने को तैयार था।
रास्ते भी अनजान थे, अनजान मंज़िल का ख़्वाब था,
जिंदगी को जी कर भी जिंदगी से अंजान था।

थी तमन्ना जानने की जिंदगी की शख्शियत ,
खैर वो इंसान जो खुद इंसानियत से अंजान था।
फिर अँधेरे और उजाले की चाल समझने चला,
जिंदगी की जंग मे , जीवन से उलझने चला।

था मुसाफिर वो तम्मना और ख्वाइशों की राह का,
उस राह पर चलते हुए उस राह से हैरान था।
फिर से उलझे धागों से एक लिबास बुनने चला,
जान कर एक बार फिर से अंजान बनने चला।

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