#Gazal lby MurtazaShagird

शहर के वही लौग अब ठेकेदार बने है…
समझ जिनकी अक्ल से  कौसौ  पडे़ है…

सच – झूठ का फर्क  जानते है मगर,
न्याय के कठघरे मै चुपचाप खड़े है…

एक कतरा खून भी है छोड़ना  हराम,
मजहब – सियासतौं के मनसुबे बडे़ है…

मेरे खुदा बन्दाए आदम पे तरस खाॅ,
सजदे मे सर झुकाए बे आस खड़े है…

“सखावत तेरी देख कर ऐ मेरे मौलाॅ”,…
दौलत के मसीहा खुदा – खुदा करे है,…

‘शागीर्द ‘ जमाने  की दसतुरे हवा है,
अदना , अालाऔ , से  खौफ  ढरे है….

311 Total Views 6 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.