#Gazal by Modh Adil Khan

आदिल फर्रुखाबादी——

तुम आईना हम पत्थर निकले
हम ही सबसे बदतर निकले

जीती जंग फिर हार गए हैं
कुछ अपने ही मुख़बर निकले

तानते थे जो अक्सर सीना
वक़्त पड़ा तो बंदर निकले

ग़म के मारों की तादात बहुत
ढूँढा जब तब घर-घर निकले

सब वक़्त की बात है ‘आदिल’
पैबंद कुर्ते में पचहत्तर निकले

तेरी खुशी की खातिर हमदम
तेरी महफ़िल से हसकर निकले

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