#Gazal by Naaz Ozair

बाँध के सर पे कफ़न तुझको निकलना होगा ,
दावा ए इश्क है तो आग में जलना होगा ।

जीतना तुम जो अगर चहते हो दिल मेरा ,
अपना अँदाजे बयाँ पहले बदलना होगा ।

राहे मंजिल में तेरे पाँव भी जख्मी होंगे ,
अपने चेहरे पे कभी खाक भी मलना होगा ।

आग जितना भी तू बरसा ले ए चढ़ता सूरज ,
शाम आयेगी तो हर हाल में ढलना होगा ।

जिंदगी कहते हैं जिसे है ढलानों का  सफर,
गिर गये आप तो मुश्किल से संभलना होगा ।

सच बता दीजिये हज़रत के इरादे क्या हैं ,
और कब तक हमें वादों पे बहलना होगा ।

रंग लायेगी मेरी जद्दोजेहद जब अय नाज़ ,
मारे हैरत के ज़माने को उछलना होगा ।

नाज़ ओजैर नाज़

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