#Gazal by Naaz Ozair

ग़ज़ल

बात जब भी हो मोहब्बत की तो बननी चहिये,
हाँडी चाहे जिसकी भी हो दाल गलनी चहिये।

दुनियाँ होती है खफा हो जाये कुछ प्रवाह नहीं,
बात सच्ची हो अगर तो मुंह पे कहनी चहिये।

आओ हम मिल बैठ कर के रास्ता ढूंढे कोई ,
जंग चाहे जिस तरह से भी हो टलनी चहिये।

मस्जिदों में बैठे रहने से चलेगा कैसे काम,
शैख़ जी को राह अपनी अब बदलनी चहिये।

जुल्म का सूरज तेरे सर पे मुद्दत से है खड़ा ,
बेहिसी की बर्फ यह अब तो पिघलनी चहिये।

जान हथेली पे लिये परवाने आ ही जायेंगे,
आपकी महफिल में कोई शमआ जलनी चहिये।

तेज रफ्तारी में खतरा जान का होता है नाज,
आदमी को दरमयानी चाल चलनी चहिये।

नाज़ ओजैर नाज़

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