#Gazal by Naaz Ozair

हो के तू राजऐ दरगाह किधर जाएगा,
तूझको मौजूद मिलेगा वह जिधर जायेगा।

किसको मालूम था के मर्दे मुजाहिद की यह नस्ल,
कुफ्र की आंखों में देखेगा तो डर जायेगा।

हक व इंसाफ की आवाज़ उठा कर देखें,
होके नेजे पे बुलंद आपका सर जायेगा।

अज़म महकम है तेरे साथ तो इंशा अल्लाह,
तप के हालात की भठ्ठी में निखर जायेगा।

फिर से निकलेगा इसी रात के तन से सूरज,
वक्त मरहम है तेरे ज़ख्म को भर जायेगा।

आपका हश्र भी होगा बुड़े लोगों जैसा,
आदमी आपके अंदर का जो मर जायेगा।

नाज़ वो ज़हर उगल करके चले जायेंगे,
शहर के अमन शीराजह बिखर जायेगा।

नाज़ ओजैर नाज़

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