#Gazal by Naaz Ozair

ग़ज़ल

पहाड़ राई का हरगिज बना न पाओगे,
मेरा वजूद कभी तुम मिटा न पाओगे।

हमारा शिजरा मुहम्मद से जा के मिलता है,
हमारे दर से कभी बद्दुआ न पाओगे।

भटक रहे हो अंधेरे में क्यूँ इधर आओ,
कु़रआन जैसा कोई रहनुमा न पाओगे।

हमारे दम से है रौशन तुम्हारा मुस्तक्बील,
हमारे हाल से आँखें चुरा न पाओगे।

यह रोगे इश्क है लग जाये कब कहाँ,
किसी किताब में लिख्खा हुआ न पाओगे।

तुम्हारे दिल में रहूंगा मैं दर्द बनके सदा,
अनायतों को मेरी तुम भुला न पाओगे।

तुम्हें है ख़ाब की दुनियाँ में रहने की आदत,
हकीकतों से तुम आँखें मिला न पाओगे।

यहाँ के लोग हैं मतलब परस्त नाज़ मियां,
यहाँ खलूसो मुहब्बत वफा न पाओगे।

नाज़ ओजैर नाज़

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