#Gazal by Pradeep Dhruv Bhopali

ग़ज़ल■■■■■■
वज़्न/अर्कान-212×4,
फाउलुन×4,रदीब-हुनरमंद को
क़ाफिया-“ओ(स्वर)या..ओ.
आइना मत दिखाओ हुनरमंद को।
रास्ता मत बताओ हुनरमंद को।
बात होगी नहीं यार उसको हज़म,
गुर कोई मत सिखाओ हुनरमंद को।
मत कहो आइना आज अंधा हुआ
सुन सके नहिं सुनाओ हुनरमंद को।
आदमी आदमी के नही काम का
राज ये मत जताओ हुनरमंद को।
चाह ऐसी बने तुम गुरूजी रहो
पास मे मत बसाओ हुनरमंद को।
तुम भले हो गुरू दूर फिर भी रहो
हाँथ भी मत लगाओ हुनरमंद को।
दाल गलती रहे आज के दौर में
यार आका बनाओ हुनरमंद को।
फायदा “ध्रुव”उठाना अगर चाहते
कर खुशामद निभाओ हुनरमंद को।
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ओजकवि शायर प्रदीप ध्रुव भोपाली,भोपाल,म.प्र.,मो.09893677052

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