#Gazal by Pradeep Mani Tiwari

जहां ये निराला न एहसान कीजे।
मगर हर बसर का तो सम्मान कीजे।
जहां मे ग़ुज़र कीजिए ये बसेरा
हो ग़ुस्ताख़ियां तो क्षमादान कीजे।
कभी घी घना हो कभी सिर्फ चना
कभी ज़िन्दगी ना हलाकान कीजे।
रहे ख्य़ाल होते सबो ये सहर भी
यही ठीक है भी ग़ुज़र मान कीजे।
अमानत बड़ी ना कभी साथ जाये
बने जो भी ख़ुद से वही दान कीजे।
फ़रेबी जहां ये मगर आप तो”ध्रुव”
मुसीबत मे कोई समाधान कीजे।

★★★★★★★★★★★★
शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली,

Leave a Reply

Your email address will not be published.