#Gazal by Pradeep Mani Tiwari

“महक”
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महक आना चले जाना यही किस्सा पुराना है।
कभी थे ठाट अब दिन ये चने खा दिन बिताना है।
कभी थी शूरमाई अब न कुछ पूछो हैं क्या हालत
सबो सहरा रहे किल्लत यही कह लो निभाना है।
सितारे हो चले गर्दिश उम्र लंबी गमो की है
हुई नासाज़ किस्मत जब यहां ठोकर ही खाना है।
सियासत में हैं पेंचोख़म यही दस्तूर ये ज़ाहिर
फ़लक मे हों सितारे भी कभी गर्दिश में जाना है।
इबारत इक नयी लिक्खें नज़र हो इस जमाने पे
कई शातिर मुल्क में जो सबक उनको सिखाना है।
सभी वाकिफ हक़ीक़त से सभलना लाज़मीं होगा
रखे सामान दहशत के उन्हें तो खोज़ लाना है।

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शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली,भोपाल

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