#Gazal By Pradeep Mani Tiwari

झरोखा हो सलामत गर तो इंसाँ की निज़ामत हो।
हमारे और सबके नाम भी कुछ तो अमानत हो।

अगर सामान बरसों का करें नेकी हिदायत ये
दुआयें भी मिलें सबकी क़बीला भी सलामत हो।

ग़िरफ्तारी हुई जो इश्क में ये तो अदावत है
दुआ करना ख़ुदा से भी सलीके से जमानत हो।

अभी नादानियाँ भी मुल्क़ में वो इक जमाने से
ज़ुदा माहौल की चाहत अगर बदली निज़ामत हो।

अदालत क्या करे कोई फ़रेबी ग़र क़रीबी हो
रहें चौबंद जायज़ ये नहीं कोई बग़ावत हो।

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कवि शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली
मो.09589349070

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