#Gazal Pradeep Mani Tiwari

ग़ज़ल★★★★★
बह्र/अर्कान-1222×4,मुफाईलुन, मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन
★★★★★★★★★★★★

नही औकात दरिया की समंदर आब लेता है।
उसे है दर्प दरिया से मगर आदाब लेता है।
समंदर है ग़ुमां पाले शहंशाई हुई उसकी
बवंडर वो उठा देगा बड़े से ख्वाब लेता है।
यही इंसान भी पाले शहंशाई जो दिल अपने
फ़लक से जो गिरे अपना ख़ुदा भी थाम लेता है।
रहें होशोहवासी में निज़ामत हो भले अपनी
ख़ुदा हरपल घड़ी का वो अगर हिंसाब लेता है।
बवंडर हो सिकंदर हो कलंदर की यही चाहत
अगर वो आजमाये तो बड़ा सैलाब लेता है।
सुनामी की तरह इंसान”ध्रुव”आता उफानों पर
मगर भूले वो दरिया से यकीनन आब लेता है।

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