#Gazal by Raj Shukla Nmr

जान ओ दिल आज भी हाजिर है हमसफर के लिये

हमने   रिश्ता   ही   बनाया  है   उम्र   भर   के  लिये

 

उनकी नजर ए करम बनी रहे अगर मुझपे

तो मैं खुद को भी मिटा दूँगा इक नजर के लिये

 

मेरे महबूब के हाथों में अगर विष भी हो

मैं अपने होंठ बढ़ा दूँगा उस जहर के लिये

 

खुदा ने भाग्य में जो उनके लिखी काली शब

तो  मै  स्वयं  को  जला डालूँगा  सहर  के  लिये

 

मेरी तड़प में कशिश बाकी अगर     न    होगी

तो फिर मैं लौट भी आऊँगा इस असर के लिये

 

वो खुल के राज कहें या न कहें फर्क नहीं

बस इशारा है उनका काफी उम्र भर के लिये

 

राज शुक्ल “नम्र”

 

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