#Gazal by Raj Shukla Nmr

तुम्हारे पास आ कर के भी तुमको  पा  नहीं पाया

रहा  ता  उम्र  संग  लेकिन तुझे अपना नहीं पाया

 

मुहब्बत कर तो ली लेकिन मुहब्बत  रास   न   आई

मैं खुद को सुन तेरे काविल कभी भी बना नहीं पाया

 

सितम कर के भी अंजानों से बैठे हो सर ए महफिल

कोई  जालिम  कहीं  हमने सनम  तुझसा  नहीं पाया

 

मेरे मन में थी सच्चाई वफा उल्फत औ अपनापन

सो तुझसा नकलीपन ता जिंदगी दिखला नहीं पाया

 

मै तेरी राह में हरदम बिछाये ही रहा पलकें

तुझ मेरी तरफ लेकिन कभी आता नहीं पाया

 

दौर ए गर्दिश में भी और अंत में मइय्यत पे भी मेरी

बेरहम    बेमुरब्बत    तेरे  को    रोता    नहीं    पाया

 

तेरी फितरत थी उल्झन पे दिये जाना नई उल्झन

उलझता ही गया यह जाल मैं   सुलझा  नहीं पाया

 

मुहब्बत  था  तू मेरी कैसे कर   देता  तुझे   रुसवा

सो किस्सा ए सितम तेरा किसी को सुना नही पाया

 

जहाँ भी जाता जख्मी होने का सब पूछते कारण

तभी तो रिसते घावों को कभी सिलवा नहीं पाया

 

मै  बिन  बैशाखी था और तुम  अहं  के साथ बैठे थे

मै तुझ तक जा नहीं पाया तू मुझ तक आ नहीं पाया

 

जिसके आगोश में दुनियाँ थी वो निकला मेरा कातिल

किसी  ने भी वफा का फल होगा    ऐसा    नहीं   पाया

 

छाई मासूमियत चेहरे पे और दिल मे है बहशीपन

राज   बहरूपिया   हमने  तेरे  जैसा   नहीं    पाया

 

राज शुक्ल “नम्र”

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