#Gazal by Rajeev Kumar Das

आसमां छू लिया ज़मीं पर लाना बाक़ी है

काग़ज़ की कश्ती को समन्दर बनाना बाक़ी है

 

मक़सद भूल कर ग़ुरूर कर बैठे झूठे दम पर

ख़ुदा के बंदे को अभी इंसान हो जाना बाक़ी है

 

याद कर हमें दुनिया में सब कुछ से नवाज़ा

चाँद तक जाने को क़दमों में पर लगाना बाक़ी है

 

तेरा तोहफ़ा है कि न लेकर आए न लेकर गए

मिट्टी से आए फिर मिट्टी का ही हो जाना बाक़ी है

 

जाओ ऐलान कर दो तुम हर शहर को आज

तेरे शहर को एक बार और गाँव बनाना बाक़ी है

 

चलो कुछ करें जिन्हें उजाले मयस्सर न होते

हर सुबह उन्हें दो कटोरे रौशनी पहुँचाना बाक़ी है

राजीव कुमार दास

हज़ारीबाग़ झारखंड

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